अयोध्या (Ayodhaya): खतरे के खिलाफ

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यह एक सुखद बदलाव है। अयोध्या (Ayodhaya) पर देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला कभी भी आ सकता है और इस फैसले को लेकर इन दिनों देश भर में जो सक्रियता दिखाई दे रही है, वह आश्वस्त करने वाली है। अयोध्या का विवाद पिछले कई दशकों से न सिर्फ तनाव का कारण रहा है, बल्कि बहुत सारे घाव भी दे चुका है।

अच्छी बात यह है कि पूरा देश हालात की नजाकत को समझ रहा है। सरकारी और गैर-सरकारी, सभी स्तरों पर स्थिति को सामान्य रखने की कोशिशें काफी तेजी से चल रही हैं। सरकारी स्तर पर देश भर में सुरक्षा के उपाय किए जा रहे हैं। नफरत फैलाने वाले किसी तरह के संदेश का आदान-प्रदान न हो, इसके लिए अभी से लाखों वाट्सएप ग्रुप बंद करा दिए गए हैं। अयोध्या में तो खैर सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम किए ही गए हैं और जवानों की अतिरिक्त टुकड़ियां भी भेजी गई हैं, देश भर के सभी राज्यों में अलर्ट जारी हो गया है।

उन 78 रेलवे स्टेशनों पर भी सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम कर दिए गए हैं, जो ऐसे मौकों पर संवेदनशील हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक से सुरक्षा उपायों पर बात की है। लेकिन इससे भी ज्यादा उम्मीद बंधाने वाली कोशिशें वे हैं, जो गैर-सरकारी स्तर पर हो रही हैं। कई स्तरों पर नागरिकों ने सद्भाव और सुरक्षा के लिए सभी संप्रदायों की संयुक्त समितियां बना ली हैं। लगभग भी समुदायों के धार्मिक नेताओं ने शांति बनाए रखने की अपील की है। और तो और, अयोध्या में तकरीबन तीन दशक से चल रहा राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का काम रोक दिया गया है और संगतराशों को अपने घर भेज दिया गया है।

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लेकिन यहां इससे भी महत्वपूर्ण वह नजरिया है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पूरे समाज में अपनी जगह बनाता दिख रहा है। पूरा मसला काफी नाजुक और विवादास्पद रहा है, इसलिए यह डर इस मुकदमे से हमेशा जुड़ा रहा कि फैसला किसी एक पक्ष में जाने पर, दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया न जाने क्या होगी? लेकिन पिछले कुछ दिनों से सभी ने यह कहना शुरू कर दिया है कि फैसला चाहे कुछ भी हो, वह उन्हें स्वीकार्य होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सहयोगी संगठनों को यह निर्देश तक दिया है कि फैसला अगर उनके पक्ष में जाता है, तो खुशी मनाने का अतिरेक किसी भी तरह से दिखना नहीं चाहिए। बढ़-चढ़कर खुशी मनाना दूसरे पक्ष को आहत भी कर सकता है, यह एहसास बनना हमारी राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

एक परिपक्व समाज सिर्फ अपनी बाधाओं को दूर करने और लगातार आगे बढ़ते रहने का काम ही नहीं करता, बल्कि वह भावी खतरों से निपटने और समस्याओं को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए भी खुद को तैयार करता रहता है। भले ही ये खतरे और समस्याएं कहीं बाहर से आ रहे हों या खुद उसके भीतर के अंतर्विरोधों से उपज रहे हों। बाहरी खतरों को निपटाना एक तरह से आसान होता है, क्योंकि ये समाज को एकजुट करने का काम भी करते हैं। अपने अंतर्विरोधों से उपजे खतरों में जोखिम इस मायने में ज्यादा होता है कि ये कई तरह के ध्रुवीकरण की वजह बन सकते हैं। अयोध्या के मसले ने हमें वह मौका दिया है कि हम अपने समाज और लोकतंत्र की परिपक्वता की एक नई मिसाल दुनिया के सामने पेश कर सकें।

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Source:-हिन्दुस्तान | Author:- Hindustan Editorial