प्रतिरोधक क्षमता मजबूत: कोरोना काल में महामारी से निपटने के लिए भारतीय चिकित्सा को मिली नई पहचान

कोरोना काल में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आयुर्वेद के उत्पादों की बिक्री करीब छह गुना बढ़ गई है। इस दौरान करीब दो सौ नए उत्पाद बाजार में आए। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की एक प्रमुख आयुर्वेदिक औषधि च्यवनप्राश है।

कोरोना से निपटने के लिए दो स्वदेशी टीकों का निर्माण कर भारत उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया, जिन्होंने टीके का निर्माण किया है। इससे भारतीय वैज्ञानिकों ने आत्मनिर्भरता के उस लक्ष्य को भी हासिल किया जिस पर हरेक भारतीय को गर्व होना चाहिए। भारत न केवल टीका बनाने के मामले में आत्मनिर्भर बना, बल्कि इस मामले में दूसरे देशों का भी मददगार बनेगा। जनसंख्या के लिहाज से दुनिया की 18 फीसद आबादी वाले भारत ने बाकी देशों की तुलना में अपनी परंपरागत या मूल चिकित्सा पद्धति यानी आयुर्वेद के बल पर न केवल महामारी के संकट से लंबे काल तक निपटा, बल्कि इसकी बदौलत बाकी देशों की तुलना में औसत मृत्यु दर डेढ़ प्रतिशत से भी कम रखने में सफल रहा। भारत ने यह भी साबित किया कि प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने पर हर तरह के वायरस से बखूबी निपटा जा सकता है। कोरोना से निपटने में भारतीय चिकित्सा पद्धति के सफल प्रयासों की सराहना विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी की है।

योग और आयुष: पीएम मोदी ने भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धति पर दिया विशेष ध्यान

यह विशेष योग है कि 2014 में देश की बागडोर संभालने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धति पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया। योग और आयुष उनके एजेंडे में थे। सबसे पहले उन्होंने योग को न केवल देश, बल्कि दुनिया में व्यवहार के स्तर पर सिरे से पहचान दिलाने में सफलता हासिल की। कहा जाता है योग के पीछे-पीछे आयुर्वेद अपने आप चला आता है। योग दिवस के एलान के डेढ़ महीने बाद भारत सरकार ने आयुष विभाग का दायरा बढ़ाकर उसे आयुष मंत्रालय का दर्जा दिया। इसमें आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी शामिल हैं। इस मंत्रालय ने कोरोना संकट से निपटने में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसने विश्व स्वास्थ्य संगठन का ध्यान भी अपनी तरफ खींचा और उसने ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना के लिए भारत को चुना। इस केंद्र के स्थापित होने के बाद दुनिया में भारत की चिकित्सा पद्धति को नई पहचान मिलेगी।

प्रधानमंत्री की पहल पर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले नुस्खों का जमकर प्रचार हुआ

दुनिया की एक विशाल आबादी भारत में रहती है और विकसित देशों की तुलना में यहां स्वास्थ्य का ढांचा भी उतना विकसित नहीं है। ऐसे में कई विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे थे कि भारत में करोड़ों व्यक्ति कोरोना संक्रमण के दायरे में होंगे और कई लाख मौत के शिकार होंगे। इन आशंकाओं ने देश को अंदर तक हिला दिया, लेकिन प्रधानमंत्री ने इस संकट की गंभीरता को शायद पहले से भांप रखा था। तभी उन्होंने सख्त लॉकडाउन के एलान के साथ कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए गाइड लाइंस जारी की। प्रधानमंत्री की पहल पर आयुष मंत्रालय ने प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले नुस्खों और औषधियों का जमकर प्रचार किया। किसी महामारी से निपटने में सरकारी तौर पर पहली बार आयुर्वेद और योग को इलाज के लिए आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई। आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेदिक दवाओं के इस्तेमाल के लिए एक प्रोटोकॉल भी जारी किया।

कोरोना संक्रमण से उपजे संकट के कारण नए-नए शोध होने लगे

कोरोना संक्रमण से उपजे संकट के कारण परंपरागत भारतीय चिकित्सा पद्धति में प्रतिरोधक क्षमता का पता लगाने के लिए नए-नए शोध होने लगे हैं, ताकि भविष्य के संकट का मुकाबला करने की तैयारी रखी जा सके। इस दिशा में प्रधानमंत्री मोदी ने आयुर्वेद दिवस के अवसर पर 13 नवंबर, 2020 को देश को दो आयुर्वेद संस्थान समर्पित किए-आयुर्वेद शिक्षण और अनुसंधान संस्थान, जामनगर और राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर। दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और जापान के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड इंडस्ट्रियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने अपने शोध में पाया है कि आयुर्वेद में इस्तेमाल की जाने वाली एक महत्वपूर्ण औषधि अश्वगंधा में ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जिनमें अद्भुत प्रतिरोधक क्षमता होती है जो कई प्रकार की बीमारियों से लड़ने में सक्षम हैं।

संक्रमण काल में भारत की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अपेक्षा से कहीं ज्यादा सफल रही

संक्रमण काल में लोगों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने को लेकर आयुष मंत्रालय आयुर्वेद दवाओं को लेकर कई स्तर पर लगातार सर्वे भी करता रहा। मसलन दिल्ली पुलिस के करीब 80 हजार जवानों को मंत्रालय की तरफ से आयुष किट दी गई। उनमें कोरोना संक्रमण नहीं के बराबर हुआ, लेकिन इसके मुकाबले किट न पाने वाले जवानों में संक्रमण आठ गुना ज्यादा था। इसके साथ मंत्रालय ने करीब डेढ़ लाख लोगों पर एक सर्वे और किया जो किसी न किसी रूप में अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए कोई न कोई आयुर्वेदिक औषधि ले रहे थे। इससे उनका बचाव हुआ और अगर संक्रमण हुआ भी तो उसकी तीव्रता काफी कम थी। दुनिया के अलग-अलग देशों ने कोरोना पर लगाम लगाने के अनेक प्रकार के प्रयोग किए, लेकिन उनके मुकाबले भारत की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अपेक्षा से कहीं ज्यादा सफल रही।

कोरोना काल में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आयुर्वेद के उत्पादों की बिक्री करीब छह गुना बढ़ी

कोरोना काल में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आयुर्वेद के उत्पादों की बिक्री करीब छह गुना बढ़ गई है। इस दौरान करीब दो सौ नए उत्पाद बाजार में आए। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की एक प्रमुख आयुर्वेदिक औषधि च्यवनप्राश है। संक्रमण काल में पूरे साल इसकी मांग कम नहीं हुई। इसी तरह गिलोय, तुलसी, हल्दी और अश्वगंधा ने भी मांग के नित नए रिकॉर्ड कायम किए। जूस का मतलब अभी तक केवल फ्रूट जूस होता था, लेकिन अब उनका स्थान आंवला, गिलोय, एलोवेरा और तुलसी जैसे जूस ने ले लिया है। इसके अलावा काढ़ा भी लोगों की जळ्बान पर ऐसा चढ़ा कि संक्रमण काल में राष्ट्रीय पेय बन गया। इससे लोग न केवल संक्रमण से बचे, बल्कि मौसमी बुखार, जुकाम और सर्दी से भी बचे। इलाज से बेहतर रोकथाम है और यह आयुर्वेद का एक बुनियादी सिद्धांत है। यह केवल विकल्प नहीं, बल्कि चिकित्सा का मुख्य आधार है जो मानवजाति को प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों प्रकार के वायरस से बचा सकता है।

[ केशव प्रसाद मौर्य ] ( लेखक उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं )

Author: Bhupendra Singh