चार सच बनाएंगे आपको बेहतर इंसान

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बेहतरी इसी बात पर निर्भर करती है कि हम इन कटु सत्यों को स्वीकार कैसे करते हैं। इन्हें स्वीकार न कर पाने का अर्थ यह होता है कि हम इनके आसपास अपने जीवन का दायरा समेट लेते हैं। हम इनसे इनकार करते हैं, इनकी अनदेखी करते हैं और खुद को सत्य के साथ जीने से रोकते हैं। पर ये सत्य हमारा इंतजार करते हैं और जितनी ही जल्दी हम इन्हें स्वीकार कर लेते हैं, हम सुखी हो जाते हैं। सत्य स्वीकार करना आसान नहीं है और इन्हें इसलिए नहीं लिखा जा रहा कि आप इन्हें पढ़कर डरें। यह सच आपको आजादी देने के लिए है। रिचर्ड रोहर द्वारा बताए गए हर सत्य का एक फल है, जो याद दिलाता है कि हर सत्य एक उपहार लेकर आता है और यह तभी मिलता है, जब हम उसे स्वीकार कर लेते हैं।

1. जीवन कठिन है

सोशल मीडिया या आसपास के लोगों की फोटो व वीडियो देखकर लगता है कि उनका जीवन हमसे बेहतर है। वास्तव में सत्य यह है कि हरेक व्यक्ति का जीवन कठिन है, चाहे वे आपको इस बात को जताना चाहें या नहीं। हाल ही में एलन मस्क से पूछा गया कि उनका शानदार दिखने वाला जीवन कैसा है? उनका जवाब था, वास्तविकता में काफी ऊंचाइयां, गहराइयां और तनाव होते हैं। मैं नहीं सोचता कि आखिरी दो शब्दों के बारे में कोई भी व्यक्ति ज्यादा सुनना चाहता है। वह सही कहते हैं, लोग यह नहीं माना चाहते कि उनके जैसा आदमी भी कठिनाई झेल रहा है। लोगों के लिए यह मानना आसान है कि वह एक के बाद एक सफलता की सीढियां चढ़ रहा है।

प्रयासहीन जीवन : हमें इस बात का अंदाजा होता है कि अगर प्रयास नहीं होगा तो काम होगा भी नहीं, इसलिए हम कोशिश करना छोड़ देते हैं और अगले क्रम के आने का इंतजार करते हैं। यह कोरी बकवास है। जीवन सभी के लिए कठिन होता है। हमारी बड़ी सफलताएं दर्द और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के बाद ही हासिल होती हैं। सवाल यह नहीं है कि आपने जीवन में दर्द का सामना किया है या नहीं, असल सवाल यह है कि जब इनका सामना होगा तो आप कैसे व्यवहार करेंगे? अपने जीवन में सीखे सभी महान पाठों पर सोचें । ऐसी कौन सी घटना थी, जिससे सफलता का पाठ मिला । मेरे मुताबिक, जहां चोट ज्यादा लगी, वहां मुझे सीखने और आगे बढ़ने का रास्ता मिला। नकारा जाना, असफलता, गिरना और शर्मिंदगी, जैसी स्थितियों में सर्वाधिक सीख मिलती है।
सीख : हां, जीवन कठिन है और यह सही भी है क्योंकि इससे इंसान आगे बढ़ना सीखता है।

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2. आप इतने भी महत्वपूर्ण नहीं

हम एक ऐसे बार में जाते हैं, जहां पहले कभी नहीं गए। शहर भी अनजाना है। वहां लड़कों का एक समूह हमें देखकर हंसने लगता है। हम सोचते हैं, क्या वे मेरी नाक या मेरे कपड़ों का । मजाक उड़ा रहे हैं। जी नहीं, ऐसा नहीं है। वे न आपको जानते हैं और न ही आपसे उन्हें मतलब है। सारा दोष केवल आपकी सोच का है। हर समय मैं, मैं और बस मैं की रट । हमें जीवन को खुद के बनाए लेंस से देखने की आदत पड़ गई है।

कडवा सच तो यह है कि आप महत्वपूर्ण नहीं हैं। लोग आपकी की हई किसी टिप्पणी या किसी नए काम में आपके प्रदर्शन के बारे में बात करके अपनी नींद नहीं खराब करेंगे। फेसबुक या ट्विटर पर की गई पोस्ट को एक तरफ रख दें तो आपके विचारों और सोच को कोई महत्व नहीं देता। हमें खुद को महत्व देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है, जिससे हम बाहर की तरफ देखने के बजाय भीतर केंद्रित हो जाते हैं। तो मान लीजिए, हम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इस बात पर समय – खराब करने की जरूरत नहीं कि लोग आपके बारे में क्या सोच रहे हैं। एक बार आपने यह मान लिया तो आप खुद ब खुद पूछेगे कि आखिर आपके लिए महत्वपूर्ण है क्या? जीवन में और क्या खास है? मुझसे ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है? यह हमें बेकार की सोच से मुक्ति देगा। हम जीवन को बेहतर समझ पाएंगे।
सीख : आप ही महत्वपूर्ण नहीं। उसे ढूंढें जो वाकई जरूरी है।

3. सब कुछ आपके बस में नहीं

हमें शुरू से यही सिखाया जाता है कि नियंत्रण करो, जो चाहिए वह हासिल करो, इसके बाद आप हमेशा खुश रहेंगे। यह रास्ता कठिन है, जिसमें विश्वास की कमी रहती है। फिर हम खुद पर ही नहीं, अपने रिश्तों और हर चीज को काबू करने में जुट जाते हैं। दूसरों के सामने कमजोर दिखने के लिए हम तैयार ही नहीं किए गए। खासकर पुरुषों में यह साफ दिखता है। हमें इस तरह से डिजाइन किया गया है कि हम अपने डर की सुनें और खुद को सुरक्षित रखने के प्रयास करते रहें, पर इसकी जरूरत नहीं है। यह नियंत्रण करने की आदत हमें और चोट पहुंचा रही है। रिचर्ड रोहर कहते हैं कि कष्ट को मिटाना चाहते हैं तो इस सोच का अंत करें कि हम नियंत्रित कर रहे हैं। तभी विश्वास की भावना बढ़ेगी। आप कुछ बेहतर कर पाएंगे।
सीख : समझें कि सब कुछ आपके नियंत्रण में नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह है कि आप विश्वास करना सीख सकते हैं।

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4. मृत्यु तो होनी है

हाल ही में अमेरिका में एक अध्ययन हुआ, जिसमें 74 फीसदी लोगों ने सार्वजिनक रूप से बोलने पर डर कबूला, वहीं 68 फीसदी ने मृत्यु से डरने की बात कबूल की। यह साफ है कि हम सभी मृत्यु से घबराते हैं। जब हम श्मशान जाते हैं तो हमारा व्यवहार बदल जाता है। मृत्यु की बात से ही लोगों में डर की भावना पैदा हो जाती है। अपने जीवनकाल को थोड़ा और बड़ा करना, स्वस्थ रहने की कोशिश करना एक बात है और मृत्यु से घबराना दूसरी बात। इससे जो वर्ष आप जोड़ेंगे, वे भी प्रताड़ित ही करेंगे। मृत्यु से घबराएंगे तो जीवन का आनंद नहीं उठा पाएंगे। मृत्यु को स्वीकार करेंगे तो निर्भय होकर आगे बढ़ेंगे।
सीख : मत्यु तो आनी है, पर अभी नहीं। जब तक वह आती नहीं, तब तक जीवन को भरपूर जियो।

Source : हिन्दुस्तान