राष्ट्र-राज्य, भूक्षेत्र एवं भूराजनीति

राष्ट्र-राज्य, भूक्षेत्र एवं भूराजनीति 

राष्ट्र-राज्य, भूक्षेत्र एवं भूराजनीति के माध्यम से किसी राज्य की संरचना, सीमा, भूराजनीति आदि को समझने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक उन विद्यार्थियों एवं अभ्यार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगी जो अन्तर्राष्ट्रीय संबंध एवं भूराजनीति को संक्षिप्त में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इस पुस्तक में राष्ट्र-राज्य के विभिन्न पहलुओं को उनके ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और भूराजनीतिक पहलुओं पर होने वाले प्रभावों के साथ वर्णित किया गया है। यह अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं और वैश्विक परिदृश्य को बिल्कुल नए विवाद, समकालीन चिंतन के सहारे प्रस्तुत करने का एक नायाब प्रयास है।

पुस्तक के प्रमुख अध्यायों में राष्ट्र, राज्य की परिभाषा, भारत में राज्य पुनर्गठन, भारतीय संघवाद का भौगोलिक आधार, प्रदेशवाद, भारत एवं पड़ोसी देश, भारत एवं विश्व, भूराजनीति आदि शामिल हैं। ऊर्जा की भूराजनीति तथा जलवायु परिवर्तन की भूराजनीति, भारत एवं सॉफ्ट पावर की भूराजनीति पर जो अध्याय हैं, उनका विवरण अन्तरावैषयिक स्वरूप में रखा गया है। 

पुस्तक में भारत एवं पड़ोसी देशों पर दी गई जानकारी भूराजनीति के प्रति एक नए परिप्रेक्ष्य को प्रतिबिंबित करता है। यह पुस्तक UPSC एवं Stage PCS के अभ्यार्थियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। 

 

राष्ट्र-राज्य, भूक्षेत्र एवं भूराजनीति

विषय सूची

खण्ड – I : राष्ट्र, राज्य एवं राष्ट्र-राज्य

अध्याय 1 : राष्ट्र, राज्य और राष्ट्र-राज्य

भूमिका, राज्य की अवधारणा, सामान्य भौगोलिक मापदंड, अन्य मापदंड, राज्य के प्रकार, आकार, आकृति, राष्ट्र की अवधारणा, राष्ट्र राज्य के आयाम।

अध्याय 2 : सीमाएं एवं परिसीमाएं

भूमिका, सीमाएं, सीमा (चौहद्दी), उत्पत्तिमूलक सीमा, आरोपित सीमाएं, विघिक वर्गीकरण, सीमांत और सीमा में अन्तर।

अध्याय 3 : मध्यवर्ती क्षेत्र

भूमिका, स्वरूप और चरित्र, मध्यवर्ती क्षेत्र का ह्रास।

अध्याय 4 : राज्य पुनर्गठन

भूमिका, रियासतों का एकीकरण, भाषाई आधार पर राज्य पुनर्गठन, भाषाई आधार और विवशताएं, समस्याएं, नए राज्यों का उदय, निष्कर्ष।

अध्याय 5 : भारतीय संघवाद का भौगोलिक आधार

भूमिका, भारतीय संघवाद का भौगोलिक आधार, निष्कर्ष।

अध्याय 6 : भारत में प्रादेशिक चेतना एवं प्रदेशवाद

भूमिका, भारत में क्षेत्रीयतावादः ऐतिहासिक विरासत, क्षेत्रीयता के स्वरूप, क्षेत्रीय चेतना का विकास, क्षेत्रीय चेतना के विकास के कारण, भारतीय राजनीति में क्षेत्रीयतावाद, भूमि-पुत्र की धारणा, क्षेत्रीयवाद की सीमितताएं, भारत के सांस्कृतिक क्षेत्र, क्षेत्रीयतावाद को रोकने के उपाय।

अध्याय 7 : राष्ट्र के खतरे : आंतरिक सुरक्षा

भूमिका, सामरिक दृष्टि का अभाव, प्रमुख चुनौतियां, आतंकवाद, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तर-पूर्व, माओवादी समस्या, गैर कानूनी प्रवसन, आन्तरिक सुरक्षा के अन्य खतरे।

अध्याय 8 : राष्ट्र के खतरे : सीमापार आतंकवाद

भूमिका, आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य, पाक प्रायोजित छद्म युद्ध की गतिकी, आंतरिक अशांति के खतरे, निष्कर्ष।

अध्याय 9 : अन्तर्राज्यीय मुद्दे

भूमिका, भारतीय संघात्मक संरचना, स्वायत्तता की मांग, केन्द्र राज्य संबंध, केन्द्र राज्य मतभेदों के निवारण की विधियां, वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के युग में अन्तर्राज्यीय संबंध, प्रमुख अन्तर्राज्यीय मुद्दे, अन्तर्राज्यीय जल विवाद, अन्तर्राज्यीय प्रवास, अंतर्राज्यीय अपराध, अन्तर्राज्यीय राजमार्ग, अन्तर्राज्यीय परियोजनाएं, अन्तर्राज्यीय परिषद्, राज्य भाषा आयोग, अन्तर्राज्यीय परिषद।

खण्ड II : भारत एवं पड़ोसी देश

अध्याय 10 : भारत-चीन संबंध

भूमिका, स्वर्णिम युग (1949-59), बिगड़ते सम्बन्ध (1959-1979), सुधरते संबंध (1979-1988), 1988 के बाद, चीन और भारत के बीच मुख्य क्षोभक, भारत की घेराबंदी की चीनी रणनीति ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’, भारत की हिंद महासागर कूटनीति, दक्षिण चीन सागर विवाद, व्यापार संबंध, अग्नि-5 के बाद स्थिति, दक्षिण एशिया में भारत और चीन, एशिया में होड़, एशिया से बाहर, भारत-चीनः भरोसा बहाली के उपाय, भारत की रणनीति, एशियाई सदी, नवीन विकास।

अध्याय 11 : भारत-पाक संबंध

भूमिका, भारत-पाकिस्तान संबंध की समस्या, भारत-पाक रिश्तों का भविष्य, अफगानिस्तान में अमेरिका भूमिका का प्रभाव, व्यापार, भारत-पाक के बीच परमाणु मुद्दे भरोसा बहाली के उपाय, नवीन विकास।

अध्याय 12 : भारत-बांग्लादेश संबंध

भूमिका, विवाद के प्रमुख मुद्दे, अमेरिका-बांग्लादेश संबंधों का असर, पूर्वोत्तर और बांग्लादेश, आर्थिक सहयोग की दिशा में प्रगति, उच्च स्तरीय संपर्क, व्यापार और आर्थिक रिश्ते, सीमा समझोता।

अध्याय 13 : भारत-नेपाल संबंध

भूमिका, 1947-1955, 1955-71, 1971-77, 1977-1991, 1999 से आगे, भारत-नेपाल संबंध के महत्त्वपूर्ण निर्धारक, कूटनीतिक महत्त्व, भारत-नेपाल संबंध में बाधक-तत्त्व, नेपाल-भारत व्यापार संधि, राजतंत्र का अंत, नेपाल में जातीय संकट, माओवादी पार्टी में विभाजन, आर्थिक संबंध, जल समझौता, रेल संपर्क समझौता, अंतरनिर्भरता का परस्पर सम्मान करता नेपाल, भारत की तीन धारणाएं, बढ़ती अनिश्चितता और संभावित नतीजे, नेपाल में चीन की बढ़ती भूमिका, एक मानवीय विदेशी नीति।

अध्याय 14 : भारत-श्रीलंका संबंध

भूमिका, मतभेदपूर्ण संबंध, 1948-1955, मित्रतापूर्ण संबंध, 1956-1976, मधुर संबंध, तनावपूर्ण संबंध 1977-1993, मधुर संबंधों की वापसी, 1994-2003, भारत श्रीलंका संबंधों में मुख्य समस्याएं, लिट्टे की हार, लिट्टेत्तर भारत-श्रीलंका संबंध, श्रीलंका के पुनर्निमाण के लिए भारत का समर्थन, यूएनएचआरसी संकल्पः श्रीलंका के खिलाफ भारत का वोट।

अध्याय 15 : भारत-भूटान संबंध

भूमिका, भूटान का महत्त्व, एकाकीपन का अंत, 1949 की संधि, भूटान के हित, भारतीय हित, आर्थिक महत्त्व, भारत-भूटान में चीन कारक, भूटान में आतंकवादी शिविर की समस्या, आम चुनाव 2013

अध्याय 16 : भारत-म्यांमार संबंध

भूमिका, म्यांमार के साथ भारत का जुड़ाव, म्यांमार में भारत की आर्थिक गतिविधियां,

म्यांमार का भारत के लिए रणनीतिक महत्त्व, म्यांमार और भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति, बिम्सटेक, संबंधों में घुलती मिठास, संबंध बनाने की पहल, सहयोग के क्षेत्र, चिंता के विषय, ऊर्जा सुरक्षा, म्यांमार के साथ भारत के संबंधों में चीन कारक, जुन्टा को प्रभावित करने के लिए भारत पर दबाव, म्यांमार में परिवर्तन : भारत के लिए अवसर और चुनौती, म्यांमार में राजनीतिक परिवर्तन भारत के हित में, अवसर और चुनौतियां।

अध्याय 17 : भारत-मालदीव संबंध

भूमिका, भारत-मालदीव के द्विपक्षीय संबंधों का विकास, मालदीव में चीन की रुचि, भारत से सम्बंधों में खटास।

खण्ड III : वैश्विक भूराजनीति और भारत

अध्याय 18 : भारत की बाह्य सुरक्षा

भूमिका, बाह्य सुरक्षा की चुनौतियां, दो मोर्चों पर युद्ध की चुनौतियां, कोर्ल्ड स्टार्ट सिद्धांत कला, उत्तरी मोर्चे पर चीन-पाकिस्तान (नेटवर्किंग) संजाल, हिन्द महासागर में चीन का खतरा।

अध्याय 19 : भारत की विश्व में भूमिका

भूमिका, भारत की विदेश नीति, दक्षिण एशिया, सं.रा. अमेरिका एवं दक्षिण एशिया, भारत-अफगानिस्तान संबंध, दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशांत महासागर, पूर्वी एशिया, यूरेशिया, खाड़ी, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफीका, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, भारत – अमेरिका संबंध, भारत-रूस संबंध, कनाडा, भारत-आस्ट्रेलिया संबंध, लैटिन अमेरिका और कैरीबियाई देश (एलएसी), संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन, बहुपक्षीय आर्थिक संबंध, निवेश और प्रौद्योगिकी संवर्धन (आईटीपी), भारतीय विश्व कार्य परिषद्, प्रवासी रोजगार संवर्द्धन परिषद् (सीपीओई), प्रवासी भारतीय और प्रवासी भारतीय मामले मंत्रालय, भारत जानो कार्यक्रम, उत्प्रवास की प्रवृत्तियां। 

अध्याय 20 : भूराजनीति

भूमिका, अवधारणा का विकास, जैव राज्य सिद्धान्त, भूरणनीति, मैकिन्डर का हृदय प्रदेश सिद्धांत, स्पाइकमैन की रिमलैंड (परिधिस्थल) अवधारणा, भूराजनीति, भूरणनीति का पुनरूद्धार, नई भूराजनीति।

अध्याय 21 : सागरीय भूराजनीति

भूमिका, अंतर्राष्ट्रीय नौपरिवहन के लिए खाड़ियों का उपयोग, आर्किपोलेगिक राज्य (द्वीपसमूह वाले राष्ट्र), विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड), महाद्वीपीय शेल्फ, गहरे समुद्र

अंतर्राष्ट्रीय सीबेड क्षेत्र, समुद्री वातावरण का संरक्षण, हिंद महासागरपरिमंडल की भू-राजनीति।

अध्याय 22 : ऊर्जा की भूराजनीति

भूमिका, प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तेल का महत्त्व बढ़ा, द्वितीय विश्व युद्ध-अमेरिका सबसे बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा, अकूत मुनाफा, ओपेक का उदय, खाड़ी देशों का महत्त्व, 1979- अमेरिका साम्राज्यवाद को धक्का, कैस्पियन इलाके का तेल क्षेत्र

तापी पाइपलाइन परियोजना, होर्मुज की खाड़ी का महत्त्व, रूस-तेल के खेल का नया खिलाड़ी, भूराजनीति और तेल की कीमतें, शेल गैस वैश्विक परिदृश्य, विश्व में शेल गैस के अनुमानित भंडार, शेल गैस से ऊर्जा भूराजनीति में बदलाव, दक्षिण चीन सागर विवाद।

अध्याय 23 : जलवायु परिवर्तन की भूराजनीति

भूमिका, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताएं, जलवायु परिवर्तन के पक्ष में साक्ष्य, वर्तमान परिदृश्य, जलवायु परिवर्तन और बाजारः भविष्य का परिदृश्य, दक्षिण पूर्व एशिया पर प्रभाव, निपटने के उपाय, जलवायु परिवर्तन की समीक्षा।

अध्याय 24 : भारत एवं सॉफ्ट पॉवर की भूराजनीति

भूमिका, सॉफ्ट पॉवर के तत्त्व, सॉफ्ट पॉवर के स्रोत, निष्कर्ष।

परिभाषिक शब्दावली

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